हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन नासिर रफ़ीई ने हज़रत मासूमा (स) के पवित्र रौज़े में आयोजित धार्मिक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि इबादतों की स्वीकृति के लिए हलाल रोज़ी, इख़लास, ईमान और लोगों के अधिकारों का सम्मान आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई अमल शरई नियमों के अनुसार सही होने के बावजूद आवश्यक शर्तें पूरी न होने के कारण अल्लाह की बारगाह में स्वीकार नहीं हो सकता।
हज़रत इब्राहीम (अ) द्वारा काबा के निर्माण के बाद अल्लाह से अमल की स्वीकृति की दुआ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बड़े से बड़ा नेक काम करने के बाद भी उसकी स्वीकृति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। हाबील और क़ाबील के प्रसंग से उन्होंने समझाया कि अमलों के आध्यात्मिक मूल्य में नीयत और तक़वा की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी तरह मस्जिदे ज़िरार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि गलत उद्देश्य से किया गया काम अपने बाहरी धार्मिक स्वरूप के कारण नेक नहीं बन जाता।
उन्होंने ईमान और नमाज़ को अमलों की स्वीकृति की बुनियादी शर्तें बताते हुए कहा कि इंसान को जीवन के अंतिम क्षण तक ईमान पर कायम रहने की दुआ करनी चाहिए। नेक काम और मानवता की सेवा के साथ नमाज़ जैसे अनिवार्य धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
हलाल कमाई के महत्व पर ज़ोर देते हुए हुज्जतुल इस्लाम रफ़ीई ने कहा कि ख़ुम्स और ज़कात अदा करना, अमानतदारी बरतना तथा कार्यस्थल पर ईमानदारी से जिम्मेदारियां निभाना भी दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने में शामिल है। काम में लापरवाही और सार्वजनिक सुविधाओं का अनुचित इस्तेमाल इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध है।
उन्होंने ग़ीबत, बदगुमानी और दूसरों को नुकसान पहुंचाने से बचने तथा पारिवारिक अधिकारों और जिम्मेदारियों का पालन करने पर भी ज़ोर दिया। अंत में उन्होंने अहले बैत (अ) की विलायत, इमामे ज़माना (अज) की पहचान और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिवार की शिक्षाओं के प्रति प्रतिबद्धता को बंदगी की महत्वपूर्ण बुनियाद बताया। हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की शहादत की बरसी के अवसर पर उन्होंने लोगों से आध्यात्मिक शिक्षाओं से लाभ उठाने की अपील की।
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